बरेली। निर्भय सक्सेना बरेली के जाने-माने पत्रकार हैं। वे निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए प्रतिमान गढ़े हैं। अब वे साहित्य के क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
विगत वर्ष उनकी पुस्तक ‘कलम बरेली की’ प्रकाशित हुई थी, जो पाठकों के मध्य काफी चर्चित रही। कहते हैं कि पाठकों की मुक्त कंठ से की गई प्रशंसा साहित्यकार के लिए बूस्टर डोज का काम करती है। यह बात निर्भय सक्सेना पर पूरी तरह लागू होती है। अपनी पहली कृति की सफलता से उत्साहित होकर वे अपनी दूसरी कृति के लेखन कार्य में पूरी तल्लीनता के साथ जुट गए।
अब उनकी दूसरी पुस्तक-“कलम बरेली की-2“ प्रकाशित हो चुकी है और पाठकों के मध्य खासी लोकप्रियता हासिल कर रही है। कलम बरेली की-2 में बरेली के तत्कालीन समाज का प्रतिबिम्ब झलकता है। यह पुस्तक बरेली का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है और हमें इसमें बरेली की समृद्ध सांस्कृतिक एवं सामाजिक विरासत की झलक मिलती है।
निर्भय सक्सेना बरेली के एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने लेखन कार्य का केन्द्र बिन्दु बरेली को बनाया है। उनकी यह पुस्तक उन शोध छात्रों के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी जो बरेली की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं साहित्यिक गतिविधियों पर शोध करना चाहते हैं। इसके साथ ही इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों को बरेली की अतीत की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक विरासत की सही एवं सटीक जानकारी मिल सकेगी।
बरेली की साहित्यिक गतिविधियों का सटीक विश्लेषण इस पुस्तक में किया गया है। जनपद के साहित्यिक सरोकार शीर्षक से समाहित लेख में बरेली के साहित्यकारों का विशद वर्णन किया गया है। इस लेख से ज्ञात होता है कि पंडित राधेश्याम कथा वाचक, निरंकार देव सेवक, पंडित नाथू लाल अग्निहोत्री नम्र, पंडित राम नारायन पाठक, वसीम बरेलवी, किशन सरोज, वीरेन डगवाल, सुकेश साहनी, खालिद जावेद तथा डा. इन्दिरा आचार्य आदि ने बरेली में साहित्य की अलख जगाई। इन साहित्यकारों ने साहित्य के क्षेत्र में पूरे देश में बरेली को अपनी अलग पहचान दिलाई।


निर्भय सक्सेना कहते हैं कि वर्तमान समय में साहित्य भूषण सुरेश बाबू मिश्रा, भगवान शरण भारद्वाज, सुधीर विद्यार्थी, आचार्य देवेन्द्र देव, रणधीर प्रसाद गौड़, रमेश विकट, हरीशंकर सक्सेना, निर्मला सिंह, रमेश गौतम, डाॅ. एन.एल. शर्मा, शिवशंकर यजुर्वेदी, कमल सक्सेना, राहुल अवस्थी, पूनम सेवक, रोहित राकेश, आनन्द गौतम, डाॅ. दीपांकर गुप्त, डाॅ. अवनीश यादव, निरुपमा अग्रवाल, शराफत अली खान, नितिन सेठी आदि साहित्य की कीर्ति पताका पूरे देश में फहरा रहे हैं। इसके साथ वे कई नवोदित साहित्यकारों का भी उल्लेख करते हैं। स्थानीय कवियों का भी काफी विस्तृत उल्लेख है। बरेली कॉलेज एवम छात्र राजनीति पर भी विस्तृत विवरण है।


‘कलम बरेली की-2’ में लेखक बरेली के राजनीतिक परिदृश्य का वर्णन भी बड़ी बेवाकी के साथ करते है। लेखक के अनुसार श्री बृजराज सिंहउर्फ आछू बाबू, धर्मदत्त वैद्य, पी.सी. आजाद, राम सिंह खन्ना, राजवीर सिंह, सन्तोष गंगवार, कुँवर सुभाष पटेल, राजेश अग्रवाल, सर्वराज सिंह, सुमन लता सिंह, प्रवीन सिंह ऐरन आदि ने बरेली में राजनीति के परचम को फहराया। वर्तमान समय में डाॅ. अरुण कुमार, मेयर उमेश गौतम, धर्मेन्द्र कश्यप, संजीव अग्रवाल, डॉ आई एस तोमर आदि बरेली की राजनीति के सिरमौर हैं।
लेखक बरेली में पत्रकारिता के परिदृश्य को रेखांकित करते हुए कहता है कि आजादी के पूर्व से ही बरेली -हिन्दी, उर्दू के साप्ताहिक एवं पाक्षिक समाचार-पत्रों का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। इन समाचार-पत्रों ने रुहेलखण्ड में आजादी की अलख जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वर्तमान समय में बरेली से अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, जनमोर्चा, दिव्य प्रकाश, अमृत विचार का प्रकाशन हो रहा है। डिजिटल न्यूज पेपर रूप में गम्भीर न्यूज एवं रुहेलखण्ड पोस्ट भी पाठकों के मध्य काफी लोकप्रिय है। शंकर दास, विनीत सक्सेना, जनार्दन आचार्य, सुभाष चोधरी, मनवीर सिंह, संजीव गम्भीर, स्वर्गीय दिनेश पवन, पवन सक्सेना, सुनील सक्सेना, निर्भय सक्सेना, राजीव शर्मा, स्वर्गीय राकेश कोहरवाल, प्रशांत रायजादा, गोपाल विनोदी, विकास सक्सेना आदि की गणना बरेली के प्रमुख पत्रकारों में की जाती है। इस प्रकार प्रस्तुत कृति “कलम बरेली की 2” के अनुसार वर्तमान परिवेश में बरेली में प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों का भविष्य उज्जवल है।


लेखक के अनुसार बरेली को चित्रांश समाज की विभूतियों ने राजनीति, समाज सेवा, शिक्षा, चिकित्सा तथा वकालत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। चित्रांश समाज के प्रमुख व्यक्तियों के रूप में वे डाॅ. अरुण कुमार सक्सेना, पी.सी. आजाद, वी पी सक्सेना, अनिल कुमार सक्सेना, किशोर कटरू, शिव कुमार वरतरिया, सुरेन्द्र बीनू सिन्हा तथा राजेन विद्यार्थी आदि का उल्लेख करते हैं।
वे कहते हैं कि बरेली निवासी प्रेम रायजादा ने तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद के अनुरोध पर भारतीय संविधान की पहली प्रति अपने हाथ से लिखी थी। वे कहते हैं कि चित्रांश समाज ने आजादी के आन्दोलन में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पी.सी. आजाद तथा बाबूराम सक्सेना का वे प्रमुख रूप से उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबूराम सक्सेना एवं कृपा देवी ने स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को मिलने वाली पेंशन लेने से इनकार कर दिया था।


इस प्रकार ‘कलम बरेली की-2’ अपने आप में बरेली के तत्कालीन समाज के विविध आयामों को समेटे हुए है। बरेली पर शोध करने वाले शोध छात्रों के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी सिद्ध होगी ऐसा मेरा मानना है। इस कृति की व्यापक विषय वस्तु हेतु मैं निर्भय सक्सेना को साधुवाद देता हूँ और कृति “कलम बरेली की 2” की सफलता की कामना करता हूँ।
सुरेश बाबू मिश्रा

By Anurag

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