आजकल के बाजारवाद वाले युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में जहां कुछ दैनिक पत्र भी आज हाशिये पर जा रहे हैं यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे से कम नहीं कहा जा सकता। अब दैनिक अखबारों संपादक नाम जैसी चीज भी गौण होती जा रही है। विज्ञापन संपादकीय लोकतंत्र को राह दिखाने की कोशिश में है और पत्रकार भी लिखने-पढ़ने से दूर होकर एक मशीनी विधा में कदम बढ़ाता ही जा रहा है। जबकि लेखन के लिए उसके सामने अब इंटरनेट खुला ही है जहां वह अपनी बात बेबाकी से रख सकता है।  आजकल टीवी की एकतरफा न्यूज, पोर्टल की भरमार वाले युग में अखबारों में देश दुनिया में चीन में कोविड की मारामारी, रूस यूक्रेन युद्ध में क्या हो रहा है क्या हम उससे अनभिज्ञ तो नहीं है। ऐसे में क्या हम अपना पत्रकार धर्म वास्तव में निभा रहे हैं। यह भी हमें सोचना होगा।
लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक स्वतंत्रता मानी जाती रही है। यह सभी स्वतन्त्रताओं से श्रेष्ठ है। इसी में प्रेस की  स्वतन्त्रता भी निहित है पर आज के ‘बाजारीकरण’ के दौर में दैनिक समाचार पत्रों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी ग्रहण लग रहा है। संपादकीय तंत्र पर विज्ञापन तंत्र का शिकंजा जिस तेजी से बढ़ रहा है उसके चलते समाचार पत्रों में संपादक नाम की चीज भी आज गौण हो गयी है। भारत में 1990 के दशक में जब न्यूज चैनल आने का रास्ता बना उसी दौर से देश के अग्रणी पत्रकार संगठन नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स ( एन यू जे आई ) के वर्ष 1982 में लुधियाना में हुये सम्मेलन में  लोकसभा के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने वहां अपने संबोधन में कहा था कि भारत जैसे देश में कितने ही न्यूज चैनल आ जाये पर दैनिक अखबारों की प्रसार संख्या पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। जबकि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने दोहराया कि समाचार पत्रों में पत्रकारों का दायित्व है कि वह एक पक्षीय समाचारों के लेखन से बचें। अभिव्यक्ति की आजादी का यह तात्पर्य नहीं होना चाहिए कि समाचार पत्र भी पार्टी बन जायें। सम्मेलन में मैंने मुख्यमंत्री दरबारा सिंह से इस मुद्दे पर बात की उन्होंने तथा आपातकाल का स्मरण कराते हुए उनसे पूछा कहीं ये व्यक्ति विशेष की खींझ तो नहीं है उनका कहना था कि आपकी बात में कुछ हद तक सच्चाई हो पर मैं पूरे समाचार तंत्र की बात कर रहा हूं इसमें कुछ अपवाद भी हो सकते हैं। पिछले दिनों हुए कई चुनाव में जिस तरह ‘पेडन्यूज’ की बात समाचार जगत से होते हुए आम जनता तथा प्रेस काउन्सिल तक पहुंची उससे पत्रकार मुंह नहीं मोड़ सकते। पर हमें यह भी स्वीकारना होगा कि आज का पत्रकार ग्लैमर की ओर आना तो चाह रहा है पर ‘न्यूज रूम की आपाधापी में अपने को कहां खड़ा पा रहा है। यह सही है कि  वह कम्प्यूटर युग में अच्छा लेआउट डिजाइनर तो बन गया है। पर तथ्यों (कन्टेन्ट) में आज कहां खड़ा है। यह सोचनीय प्रश्न हैं ?

देश में आज हजारों की संख्या में मीडिया शिक्षण संस्थान खुल गये हैं। जहां छात्रों से लाखों रूपये की फीस ली जाती है। पर वहां से निकले छात्र उन संस्थानों द्वारा संचालित समाचार पत्रों में भी अपने को फिट नहीं पा रहे हैं। यह बात कई मीडिया घरानों के संपादकों ने भी अपनी निजी बातचीत में यह पीड़ा उजागार की। आजादी से पूर्व के वर्षों में ऐसे विज्ञापन भी प्रकाशित होते थे कि संपादक चाहिए वेतन 2 सूखी रोटी तथा एक पैर जेल जाने को तैयार रखे। ब्रिटिश पुलिस का अत्याचार झेलने की क्षमता हो। पर आजकल के इस बदल चुके बाजारी युग में कुछ संपादकों का वेतन तो लाखों रूपये मासिक में पहुंच गया पर उस पद पर आने वाला संपादक क्या विष्णु राव पराड़कर, धर्मवीर भारती, राजेन्द्र माथुर, चेलापति राव, प्रभाष जोशी, हीरानन्द वात्सायन अज्ञेय, कमलेश्वर, विनोद शुक्ला, राजनाथ सिंह सूर्य, वीरेंद्र सिंह, जे बी सुमन, बच्चन सिंह, जैसा रुतवा पा रहे हैं। लखनऊ के पत्रकार बताते थे कि ‘नेशनल हेराल्ड’ के संपादक चेलापति राव की दिल्ली में मौत के बाद उनका शव अज्ञात में पोस्ट मार्टम हाउस तक पहुंच गया। चेलापती राव के लापता होने की बात जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को मालूम पड़ी तो पूरे तंत्र में खलबली मच गयी। उनका शव बाद में पोस्टमार्टम हाउस में खोजा जा सका। जहां श्रीमती इंदिरा
गांधी उनको श्रद्धांजलि देने भी पहुंची थीं । नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स व यू पी जर्नलिस्ट एसोसिएशन (उपजा) के प्रयासों से पत्रकारों को पालेकर वछावत मणिसाना, मजीठिया जैसे वेतन कमीशन की संस्तुतियां देश में लागू हुई। यह बात अलग है कि  मीडिया घरानों ने उनका लाभ चुनिंदा पत्रकारो को ही दिया। अब तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी _ 2 की सरकार ने श्रम कानूनों में सुधार कर उसका चार भागों में वर्गीकरण कर दिया जिससे श्रमजीवी  पत्रकारों की नये कानूनों के तहत कई सुविधिायें कम हुई और उनको आगे इन नये कानूनों से समस्यायें ही पैदा होगी। पहले  की तरह अब भी  अगर पत्रकार संगठन आगे नहीं आते तो पत्रकारों की सामूहिक लड़ाई पूरी नहीं होगी। कोविड 19 के बाद आज पत्रकारों को यह सोचना होगा कि हम अपने को समय के साथ कितना बदल रहे हैं। सरकार ने पत्रकारों को कोरोना वारियर्स तक नहीं माना। देश में उस दौरान कई पत्रकार का निधन हुआ। बरेली में भी आशीष अग्रवाल, प्रशांत सुमन, रामा बल्लभ शर्मा, नूतन सक्सेना, मोहमद युसुफ आदि पत्रकारों को कोरोना निगल गया।आजकल देश में क्या लिखा जा रहा है उसे पढ़ने में भी क्या हम रुचि ले रहे हैं। अखबारों में देश दुनिया में चीन में कोविड की मारामारी, रूस यूक्रेन युद्ध में क्या हो रहा है क्या हम उससे अनभिज्ञ तो नहीं है ऐसे में क्या हम अपना पत्रकार धर्म निभा रहे हैं। यह हमें सोचना होगा। पत्रकार समाज में तभी पहचाना जायेगा जब उसकी कलम में ताकत होगी। कलम की ताकत तभी बढ़ेगी जब हमारा मस्तिष्क देश दुनिया के घट रही घटनाओं तथा अन्य सभी चीजों को जानने के लिए खुला होगा। तभी हम सर्वधर्म सद्भाव पर भी अपना पक्ष कायम रख पायेंगे। पोर्टल की भरमार वाले इस बाजारी युग में हमारी सक्रिय सतर्कता से झोलाछाप पीत पत्रकारिता कहीं भी नहीं टिक पायेगी।

 निर्भय सक्सेना

By Anurag

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