बरेली। वर्ष 1950 – 1970 का वह दौर कुछ अलग ही था। सभी को अपने अपने बोर्ड के हाई स्कूल के रिजल्ट का इंतजार होता था। उत्तर प्रदेश में यू पी इलाहाबाद बोर्ड हाई स्कूल रिजल्ट का भी परीक्षार्थियों को इंतजार रहता था। हर जिले की तरह अपने बरेली के छात्रों में भी घबराहट एवम उत्सुकता बरकरार रहती थी। पूरे मोहल्ले को पता होता था की सक्सेना जी का लड़का एवम शर्मा जी की बेटी ने भी हाई स्कूल का इम्तहान दिया है। कुछ जागरूक लोग भी अपने अपने संपर्कों को है स्कूल का रोल नंबर देकर रिजल्ट पता करके अपने परिचितों को बता देते थे। है स्कूल इंटर का रिजल्ट आने से पहले ही उस समाचार पत्र की एडवांस बुकिंग समाचार पत्र वितरक करा लेते थे। ताकि उसे उसकी उतनी प्रतियां मिल जाएं। बरेली में कोतवाली एवम कुतुबखाने पर अखबार वितरकों का जमावड़ा रहता था। एजेंट भी पेपर वितरक को अधिक कीमत पर बेचते थे। कुछ लोग मांगे गए कीमत पर समाचार पत्र खरीद कर 10 से 20 रुपए में नंबर बता कर उसकी कीमत वसूल लेते थे। वितरक भी समाचार पत्र में रोल नंबर देख कर बताते थे। उस समय पुलिस की देखरेख में ही लखनऊ से आने वाले नेशनल हेराल्ड, स्वतंत्र भारत, पायनियर में ही अधिकतर रिजल्ट आता था। इलाहाबाद हाई स्कूल इंटर मीडिएट बोर्ड का पूरा रिजल्ट 50 = 60 प्रतिशत हो और उसमें भी आपकी थर्ड डिविजन आ गई तो भी पूरा परिवार प्रसन्न हो जाता था। बाद में रिजल्ट दैनिक जागरण या अमर उजाला में भी प्रकाशित होने लगा। रुहेलखंड विश्व विद्यालय के रिजल्ट भी इन्ही समाचार पत्र में प्रकाशित होते थे। मुझे याद है वर्ष 2000 तक तो यही हाल था। में जब दैनिक जागरण में था तो मेरे पास भी समय समय पर कुछ अभिभावक या परीक्षार्थी रोल नंबर हाई स्कूल ही नहीं स्नातक एवम परा स्नातक के नंबर पूछने बालों के फोन आते थे। और उन्हें में उनका रिजल्ट भी कंप्यूटर पर देख कर समाचार पत्र आने से पहले ही बता देता था। इसे आप मेरी बेईमानी माने या परिचितों के प्रति निष्ठा।
कुछ अभिभावकों द्वारा भी हाई स्कूल के बच्चो को यू पी बोर्ड के नाम से बचपन से ही डराया जाता था। यही कारण था कुछ छात्र वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से विरत हो जाते थे।
हाईस्कूल में पढ़ाई, प्रैक्टिकल, के बाद जब परीक्षाफल का दिन आता। तो घबराहट ओर बढ़ जाती थी। भोजन अच्छा नहीं लगता था।
लगभग हर जिले में परीक्षाफल प्रकाशित करने वाले समाचार पत्र की पूर्व में ही एडवांस बुकिंग हो जाती थी। शाम से लेकर रात तक समाचार पत्र की प्रतियां आने का इंतजार होता था। जिसको भी जिस भी समय समाचार पत्र की प्रतियां पहले मिल जाती थी। वह अपने साइकिल या अन्य वाहन से तीर की गति से अपने अपने एरिया में पहुंच कर रिजल्ट रिजल्ट की पुकार लगता था। ऊंची दर पर कुछ लोग समाचार पत्र को खरीद लेते थे। बाद में कुछ उत्साही लोग या युवा वितरक भी विद्युत पोल के नीचे या ऊँचे चबूतरे पर बैठ जाता। भीड़ से घिरकर भी फिर वहीं से नम्बर पूछ कर 10 से 20 रुपए में रोल नंबर बताया जाता था। जो छात्र पास हो जाता वह उसके पास जाकर अपना नम्बर पुन देख लेता था। सड़क किनारे लगे स्ट्रीट पोल की रोशनी में समाचार पत्र में परीक्षाफल में अपना नंबर देखकर ही उसे संतुष्टि मिलती थी फिर हाथ जोड़कर अपने आराध्य या गुरु का स्मरण कर उनका आभार व्यक्त करते या मंदिर में जाकर प्रसाद भी चढ़ाते। जिन बच्चो का नम्बर समाचार पत्र में नहीं होता। वह घर जाने पर मुंह लटका लेते थे। उनको परिजन ढांढस बंधाते थे। या कुछ की परिजन कुटाई भी कर देते थे। ताने मिलते थे की कई बार कहा की पढ़ लिया करो तब कहते थे सब याद ही है। पर रिजल्ट में क्यों गोल हो गए।
आजकल की महंगे स्कूल की पढ़ाई और बाद में कोचिंग की पढ़ाई खेलकूद से दूर आजकल अब बच्चों के नंबर भी तो 99, 98.5, 98.7 प्रतिशत में आने लगे हैं। पर पहले बच्चे निश्चित समय में ही पढ़ाई कर प्रथम श्रेणी में पास भी होते थे। और अपनी मनपसंद कोर्स में दाखिला भी पा जाते थे। साधारण स्कूल में पढ़े कई बच्चे अपनी प्रतिभा के दम पर अपने अपने क्षेत्र में नाम भी रोशन कर चुके हैं।

निर्भय सक्सेना

By Anurag

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