बरेली नगरी उर्दू और फारसी के विद्वानों का केन्द्र रही है। इस नगरी ने कई भाषाओं के अखिल भारतीय स्तर के विद्वान देश को दिये। सभी कार्यों में अग्रणी रहने वाली इस बरेली नगरी का हिन्दी पत्रकारिता की सेवा में भी योगदान है जिसे आज हम सब भूल चुके हैं।सन् 1857 के विद्रोह ने बरेली को बहुत प्रभावित किया। कई माह तक पूरा जनपद अस्तव्यस्त रहा। जगह-जगह लूट-पाट होती रही। कंपनी सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प करने वाले असफल रहे और उन्हें खुले आम पेड़ों पर लटका दिया गया। हफ्तों इन फांसियों के प्रदर्शन होते रहे। इन कठोर दृश्यों के दर्शक सब कुछ देखकर विवश थे उन्हें इस संबंध में कुछ बोलने का अधिकार भी प्राप्त न था। यह पीढ़ी अंग्रेजी शासन में ही अपनी सुरक्षा और भलाई समझकर धर्म और दर्शन की ओर मुड़ गई।
बरेली में दार्शनिक संस्था ने जन्म लिया – ‘तत्वबोधिनी सभा’। इस सभा ने सन् 1859 में एक मासिक पत्रिका ‘तत्वबोधिनी पत्रिका’ निकाली जिसके संपादक श्री गुलाब शंकर थे। यह पत्रिका दार्शनिक विषयों की विवेचना करती थी। इस पत्रिका का विशेष विवरण नहीं मिलता। मात्र इसके प्रकाशन की ही सूचना है।इसी काल में बरेली से केशव चन्द के संपादन में ‘ब्रह्मज्ञान प्रकाश’ का प्रकाशन हुआ। विदेशी संग्रहालयों की सूची में इस पत्रिका के प्रकाशन की सूचना प्राप्त होती है।
सन् 1895 में बरेली आर्य समाज के सहयोग से एक पत्र ‘आर्य पत्र’ प्रकाशित हुआ। आर्य समाजी विचारधारा का यह पत्र अपने समय में लोकप्रिय रहा। इसके संपादक आदि का पता नहीं लगता। नाटककार और रामायण के रचयिता पं. राधेश्याम कथावाचक ने अक्टूबर 1922 में अपने राधेश्याम प्रेस से एक मासिक पत्र ‘भ्रमर’ निकाला। इसका वार्षिक मूल्य तीन रू. तथा एक प्रति का चार आना था। कुल पृष्ठ संख्या 32 या 40 होती थी। आरम्भिक आठ अंकों का संपादन मालवा के विद्वान पं. गोपी बल्लभ उपाध्याय ने किया। सितम्बर 1923 से इस पत्र का संपादन राम नारायण पाठक को दिया गया।
‘भ्रमर’ के दो ही स्वरूप हमारे सामने हैं। प्रथम वर्ष के ग्यारह अंक जो मैटर और छपाई दोनों दृष्टिकोणों से साधारण हैं। दूसरी फाइल ‘भ्रमर’ के नवम्बर 27 के अक्टूबर 28 के बीच के अंकों की है जो छपाई, कागज और मैटर तीनों ही दृष्टियों से श्रेष्ठ हैं। ‘भ्रमर’ के सन् 1922-23 के अंकों से हमें निम्नलिखित कवियों पं. राम नारायण पाठक, प्रियम्वदा देवी श्रीवास्तव, पं. राधेश्याम कथावाचक, श्रीधर पाठक, पं. दुर्गाशंकर शर्मा ‘शंकर’, श्री चितचोर, पं. मदनमोहन लाल शर्मा आदि की रचनाओं के दर्शन होते हैं। लेखकों में पं. गोपाल प्रसाद शर्मा, पं. रामचंद्र शास्त्री सोरों, श्री निगुर्ण, श्री शिव नारायण श्रीवास्तव, श्री उदयशंकर भट्ट, श्रीयुत कपूर बी.ए., पं. गोविन्द बल्लभ शास्त्री, श्री शंकर राव जोशी, श्री युगलत्मा, श्री महादेव चौधरी, श्री चंडी प्रसाद ‘ह्दयेश’, श्री राम किशोर शर्मा बी.ए., श्री राम नारायण चतुर्वेदी और श्रीधर प्रमुख रूप से छपे।
‘भ्रमर’ के इन अंकों में अधिकांश कहानियां बंगला से अनुदित होकर छपती रहीं। अनेक समकालीन पत्र-पत्रिकाओं की सूचनाएं जो भ्रमर के प्राप्ति स्वीकार स्तंभ में छपती थीं महत्वपूर्ण हैं।
‘भ्रमर’ के 1927-28 के अंक अपेक्षाकृत अधिक आकर्षक और श्रेष्ठ रचनाओं से युक्त हैं। लेखक और कवि अधिकांश बदल गए। लेखक और कवियों की यह नई नामावली भी देखने योग्य है। श्री अंबिका प्रसाद भट्ट अंबिकेश, श्रीमद भागवत प्रसाद वर्मा ‘दुखित’, श्रीयुत जगदीश चन्द्र शास्त्री, श्री जगन्नाथ मित्र गौड़ कमल, श्री रामवचन द्विवेदी, ‘अरविंद’ श्री बालकृष्ण बलदुआ, श्री नत्थूराम अग्निहोत्री, श्रीहरिचरण श्रीवास्तव मराल, श्री कर्ण कवि, श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय, श्री भारत सिंह बघेल, श्री मंजुल, श्री गौरी शंकर ‘शांत’, श्री महेन्द्र मिश्र ‘मग’, श्री रामशंकर मिश्र ‘श्रीपति’, श्री बल्देव प्रसाद मिश्र, श्री छैल बिहारी दीक्षित ‘कंटक’, श्री प्रेमपुष्प और श्री गुप्तेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव छपते रहे। ‘भ्रमर’ की प्रतियों से सन् 1927-28 में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं का परिचय भी प्राप्त होता है।
होली के अवसर पर मार्च के अंक में ‘भ्रमर’ एक स्तंभ दिया करता था-‘नशे की झोक में’। इस स्तंभ में हास्य व्यंग्य के माध्यम से हिंदी के सभी छोटे बड़े पत्रों की चर्चा होती थी। क्षेत्रीय लेखकों और कवियों की अनेक दुष्प्राप्य रचनायें ‘भ्रमर’ के पृष्ठों में दबी पड़ी हैं। प्रति अंक में पं. राधेश्याम कथावाचक का भी कोई न कोई लोक काव्य छपता था और मोटे टाइप से छपे कुछ पृष्ठ पृथक से जोड़े जाते थे। बरेली के उर्दू के शायर श्री मदललाल ‘दाना’ ने संपूर्ण बिहारी सतसई को उर्दू शेरों में बड़े करीने से अनुवाद किया था। ‘भ्रमर’ में यह अनुवाद भी धारावाहिक प्रकाशित होता था। ‘भ्रमर’ के अंकों में बरेली क्षेत्र के अनेक गद्य-पद्य रचयिताओं की अमूल्य रचनाएं सुरक्षित हैं। आज हम उन रचनाओं को भूल चुके हैं।
पं. राधेश्याम कथावचक ने बरेली की कई काव्य प्रतिभाओं को ‘भ्रमर’ के माध्यम से साहित्य में अग्रसर किया। ‘कथावाचक’ के कवियों की संख्या काफी बड़ी है। उस पर यहां चर्चा न करके दो अन्य बरेली के ऐसे पत्रों की चर्चा होनी जरूरी है जो काफी दिनों तक चलते रहे और जिनका प्रकाशन सन् 1930 से पूर्व का है।श्री गंगा सहाय पराशरी ने बरेली से एक पाक्षिक का प्रकाशन आरंभ किया और उसका नाम रखा-‘कमल’। पाक्षिक कमल की छपाई-सफाई भी अच्छी थी। लेख और कविताओं का संग्रह भी प्रशंसनीय होता था। बत्तीस पृष्ठों के इस पत्र का मूल्य दो रू. वार्षिक था। सन् 1925 में बरेली से -‘पुष्कर’ मासिक का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके संपादक थे श्री ब्रजेन्द्र चन्द्र मिश्र शास्त्री। इसे पं. गंगा सहाय पाराशरी सुन्दर निकेतन से प्रकाशित करते थे। 52 पृष्ठों के इस मासिक का वार्षिक मूल्य था ढाई रू. समकालीन पत्रों की आलोचनाओं से पता लगता है कि इसका कागज और छपाई बढ़िया तथा रचनाएं उत्तम एवं भावपूर्ण होती थीं। यह श्रेष्ठ पत्र कब तक चला इसकी कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। बरेली से सन् 1930 से पूर्व प्रकाशित होने वाले इन छह पत्रों का परिचय अधूरा है फिर भी जितना प्राप्त है उतना सुरक्षित रह सके इसी दृष्टि से आप सबके हाथों सौंपा जा रहा है। पत्रकारिता दिवस पर बरेली की पत्रकारिता को याद कर उन पत्रकारों,रचनाकारों के प्रति श्रद्धांजलि भी है जिनका बरेली की पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान रहा।

प्रस्तुति: सुरेन्द्र बीनू सिन्हा, 326, कहरवान, बिहारीपुर, बरेली

By Anurag

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